कारगिल के इस हीरो को सलाम, खून का आखिरी कतरा कर दिया था देश के नाम


सौरभ कालिया की पुण्यतिथि पर विशेष
लिख रहा हूँ मैं अंजाम जिसका कल आगाज आएगा,
मेरे लहू का हर कतरा इंकलाब लाएगा,
मैं रहूँ या ना रहूँ पर एक वादा है तुमसे मेरा,
की मेरे बाद वतन पे मरने वालों का सैलाब आएगा…
ये पंक्तियां उस शहीद के लिए हैं जिसे अपनी छाती पर जख्म तो मंजूर थे लेकिन अपनी मातृभूमि पर दुश्मनों के कदम मंजूर नही थे। इस मातृभूमि के ऐसे कई अनगिनत लाडले हैं जिन्होंने देश की सीमाओं को दुश्मन के नापाक हाथों से बचाने के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया। लेकिन 22 वर्षीय सौरभ कालिया के बलिदान को यह देश कभी विस्मृत नही कर सकता।
1999 के कारगिल युद्ध की आहट की सूचना भारतीय सेना को अपने हरफनमौला युवा अधिकारी सौरभ कालिया के माध्यम से ही मिली थी। उन्होंने एलओसी पर बड़ी संख्या में घुसपैठ की रिपोर्ट दी थी। बर्फ से पटे कारगिल में 13000 से 14000 फीट ऊंचाई पर स्थित बजरंग चौकी की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी उनके कन्धों पर ही थी। 15 मई 1999 को कैप्टन सौरभ कालिया जब अपने 5 अन्य साथियों सिपाही अर्जुनराम, भंवरलाल बगाडिया, भीखाराम, मूलाराम और नरेश सिंह के साथ काकसर लांगपा क्षेत्र में गश्त कर रहे थे, तभी ऊबड़ खाबड़ रास्तों वाले लद्दाख के नंगे पहाड़ों की ओर से बड़ी संख्या में पाकिस्तानी घुसपैठियों ने भारतीय दल पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। बजरंग चौकी के पहरेदार भारतीय शूरवीरों ने कैप्टन कालिया के नेतृत्व में पूरी ताकत के साथ दुश्मनों का मुकाबला किया, लेकिन गोलाबारूद की कमी और समय से सुरक्षा कवर न मिल पाने के कारण ये भारतीय वीर पाकिस्तानी रेंजरों के हाथ आ गए। पाकिस्तानी रेडियो स्कर्दू की सूचना से मालूम हुआ कि सौरभ और उनके साथी सैनिक पाकिस्तान के कब्जे में हैं। सैकड़ों घुसपैठिये एलओसी पर भारत की सीमा के अन्दर घुस गए थे।
15 मई से 7 जून तक कालिया और उसके साथियों को पाकिस्तानी घुसपैठियों ने इतनी यातनाएं दी कि उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। 9 जून को पाकिस्तानी सैनिकों ने सौरभ और उनके साथियों के क्षत विक्षत शव भारतीय सेना को सौंपे।
सौरभ और उनके साथियों को ऐसी यातनाएं दी गई जिसकी कल्पना भी नही की जा सकती। उनके शरीर को सिगरेट से जलाया गया, कान गर्म राड़ से छेदे गए, आँखें निकाल दी गईं, दांत व हड्डियां तोड़े गए, सिर फोड़े गए, होंठ काटे गए, नाक और अन्य अंग काट दिए गए. ये सारे जख्म उनके शरीर पर मौत से पहले के थे, यह युद्धबंदियों के साथ वियना सम्मेलन की शर्तों का खुला उल्लंघन था। लेकिन नापाक इरादे रखने वाले पाकिस्तान को मानवाधिकार या अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी
की कब परवाह रही। पूरे देश में पाकिस्तान की इस कायराना और घटिया हरकत के प्रति रोष बढ़ा और पाकिस्तान को यादगार पाठ पढ़ाकर अपने बहादुर सैनिकों का बदला लेने का एक स्वर बुलंद हो उठा, जिसने आगे कारगिल युद्ध का बड़ा रूप लिया।
माँ भारती के सच्चे सपूत सौरभ कालिया का जन्म 29 जून, 1976 को रणबांकुरों की धरती पंजाब के अमृतसर में डॉ. एनके कालिया और विजया के घर हुआ था। हिमाचल प्रदेश के पालमपुर स्कूल से दसवीं पास की तो 1997 में बीएससी, सीडीएस की प्रतियोगी परीक्षा देकर 12 दिसंबर 1998 को सेना में कमीशन प्राप्त कर सेना लेफ्टिनेंट बने।
विडम्बना यह है कि जिस देश के लिए सौरभ ने इतनी यातनाएं सही, उसी सौरभ के पिता आज अपने ही देश मे बेटे को इंसाफ मिलने की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
कैप्टन सौरभ कालिया की शहादत को शायद देश भुला चुका है। यही वजह है कि अपने बेटे के लिए इंसाफ़ माँग रहे बुजुर्ग माता-पिता दर-दर भटक रहे हैं। ठोस प्रमाण के बावजूद सरकार आज तक शांत है और यह दु:ख की बात है। बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने विपक्ष में रहते हुए इस मुद्दे को उठाया है, लेकिन सत्ता में रहने पर उनकी राजनीति व कार्यनीति में अंतर साफ नजर आता है।
सवाल यह उठता है कि सौरभ कालिया ने तो दुश्मनों से जंग लड़ी लेकिन उनके आखिर किस से जंग लड़ रहे हैं। इस देश की न्यायपालिका से या फिर अपनी सरकार से या हमसे, जो इस सिस्टम से थककर गूंगे और बहरे हो चुके हैं।
आज उनकी पुण्यतिथि है। बेशक आज उन्हें सरकारों ने भूला दिया लेकिन वह उन तमाम युवाओं के जेहन में आज भी जिंदा हैं जो माँ भारती की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिए ततपर हैं।
आओ, झुक के सलाम करे उनको,
जिनके हिस्से में ये मुकाम आता है,
खुशनसीब होते है वो लोग,
जिनका खून देश के काम आता है….

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