त्रिलोकपुर मन्दिर: यहां शिव के श्राप से पत्थर बन गया था गड़रिया

नूरपुर
शिव ही सत्य है, शिव ही सुंदर है। वो शिव ही है जो इस ब्रह्मांड के हर कोने में वास करते हैं। वो शाश्वत हैं वो देवों के देव महादेव हैं। हिमाचल को देव भूमि के नाम से जाना जाता है। लेकिन यह सिर्फ देव भूमि ही नही बल्कि देवों के देव महादेव को तपोस्थली भी है।
आज आपको ऐसी तपोस्थली के बारे में बताएंगे जहां शिव ने साधना की थी। यहां मौजूद ये गुफा अपने भीतर कई अनसुलझे रहस्यों को छिपाए बैठे है। नूरपुर से 30 किलोमीटर की दूरी पर एक छोटा सा स्थान है त्रिलोकपुर। यहाँ सड़क किनारे गुफानुमा एक प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर के अंदर छत से विचित्र जटाएं लटकती हैं, जिन्हें देख कर ऐसा लगता है मानो छत से सांप लटक रहे हों। यहां मौजूद शिवलिंग किसी इंसान या देवता ने नही बल्कि खुद महादेव ने स्थापित किया है। गुफा के भीतर प्रवेश करते ही सिर अपने आप शिवलिंग के समक्ष झुक जाता है। मन्दिर के बाहर एक छोटा सा नाला भी बहता है, जिसमे कई विशाल शिलाएं हैं। इन शिलाओं को देख कर ऐसा लगता है मानो बहुत सी भेड़ें नाले में लेती हैं।


माना जाता है कि सतयुग में मन्दिर के अंदर के स्तम्भ स्वर्ण से बने थे। जब शंकर भगवान तपस्या करते थे तो शेषनाग के मुख से दूध की धारा उनकी जटाओं पर गिरती थी। एक दिन एक गड़रिया अपनी भेड़ों को लेकर यहां से गुजर रहा था। उसने देखा कि कोई साधु यहां तपस्या कर रहा है और उसके दोनों और सोने के स्तम्भ हैं। गड़रिये के मन मे लालच आ गया और उसने सोने के स्तम्भों से सोना निकालना शुरू कर दिया। तभी तपस्या में लीन भोलेनाथ ध्यान मुद्रा से बाहर आए और उन्होंने कहा कि सतयुग में ही ऐसे कार्य हो रहे हैं तो कलयुग में क्या होगा। भगवान शिव ने क्रोधित होकर गड़रिये को श्राप दे दिया जिससे उसकी भेड़ें और गड़रिया पत्थर में तब्दील हो गए, जो आज भी गुफा में उसी मुद्रा में मौजूद हैं। शिव के श्राप ने आसपास की सभी चीजों को पत्थर में बदल दिया साथ ही जो सोने के स्तम्भ थे वो भी पत्थर में बदल गए।
भोलेनाथ की इस तपोस्थली में आकर ऐसा प्रतीत होता है कि गुफा अपने अंदर कई रहस्य समेटे है। पत्थर का सर्प आज भी महादेव का जलाभिषेक करता है। लोगों की इस मंदिर में अटूट आस्था और श्रद्धा है। शायद यही वजह है कि लोगों को यहां हर पल भगवान शिव के होने की अनूभूति होती है। 

Spread the love