“पांडेया आला शैर” के नाम से मशहूर था यह गांव, कभी बनते थे पीतल के बर्तन


9 जून। नूरपुर
प्रदेश में कई ऐसे इतिहासिक शहर हैं जो अपनी अनूठी कारीगरी की वजह से आज भी ख़ास पहचान बनाये हुए है। जिला कांगड़ा में ऐसा ही एक शहर है गंगथ। इस शहर में कभी औज़ारों की गूँज दूर दूर तक सुनाई देती थी। गंगथ शहर का इतिहास लगभग पांच सौ वर्ष पुराना है। लगभग पांच सौ वर्ष पहले यह शहर छौंछ खड्ड के किनारे पांच किलोमीटर में बसा हुआ था और उस समय यहां उम्दा कारीगरों का एक बहुत बड़ा समूह रहता था, जो पंदोड़ गांव तक फैला था। लगभग 200 वर्ष पूर्व यहां अस्त्र-शस्त्र का निर्माण, जेवर रखने वाले लॉकर, कुट्टू और पीतल के बरतन बनाए जाते थे, जो पंजाब व चंबा से होते हुए जम्मू तक भेजे जाते थे। उन दिनों उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद की तर्ज पर गंगथ को छोटा मुरादाबाद कहा जाता था। 100 किलोमीटर के दायरे में मात्र यही एक ऐसा शहर था, जहाँ पीतल के बर्तन बनाये जाते थे। पीतल के बर्तनो के कारोबार की वजह से इसे स्थानीय बोली में “पांडेया आला शैर” कहा जाता था (बर्तनो वाला शहर)। इलाके की अधिकतम लोग आज भी इसे इसी नाम से पुकारते हैं। 200 साल पहले यहां के कारीगरों का काम को देखकर हर कोई उनका मुरीद था। उस वक्त यह एक मुस्लिम समुदाय बहुल क्षेत्र था। इलाके में हिन्दू मुठी भर ही थे। जो हिंदू कारोबार करते भी थे, उनके पास मुस्लिम ही मुख्य कारीगर होते थे। प्रदेश के अधिकतम इलाकों में धाम बनाने के लिए पीतल के बड़े बर्तनो का उपयोग किया जाता था जिन्हे स्थानीय भाषा में बल्टोही कहा जाता है। इस इलाके में पहले बल्टोही बनाने वाले 60 -70 परिवार थे तो आज सिर्फ एक दो परिवार ही ऐसे हैं जो वर्षों पुराने कारोबार को चला रहे है। वर्षों पहले पीतल की बल्टोहियों का अपना रसूख था। 100 वर्ष पहले तक जिस घर में जितनी ज्यादा बल्टोहियां होती थीं, उसे उतना ही अमीर व खानदानी आदमी समझा जाता था। बल्टोहियों के काम में मुनाफा ज्यादा था। लेकिन आधुनिकता के साथ बल्टोही की जगह अब स्टील के बर्तनो ने ले ली, जिस वजह से ये कारोबार बंद हो गया। आधुनिकता ने इस कारोबार को ऐसा ग्रहण लगाया की कभी जिस शहर में रोजाना बर्तन पीटने की आवाज गूंजती थी, आज वहां कभी कभार ही ऐसे आवाज सुनाई देती है। गंगथ में बल्टोही बनाने वाले एक परिवार से जब इस बारे में बात की गई तो उन्होंने बताया की बल्टोही के कारोबार के कारण इस जगह का नाम पांडेया आला शैर पड़ा था। इनके अनुसार अब कारोबार लगभग खत्म है और सिर्फ आर्डर मिलने पर ही बल्टोही बनाई जाती है।

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